Monday, 29 January 2018

क्रांति तो होनी है....

अगर खिलाफ है होने दो, चाँद थोड़ी है
ये सब धुआ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आयेंगे घर कई जद में
यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है

मुझे खबर है के दुश्मन भी कम नहीं
हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुह से जो निकले वही सदाकत है
हमारे मुह में तुम्हारी जुबान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद है कल नहीं होंगे
किरायेदार है ज़ाती, मकान थोड़ी है

सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है-

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साजिशे हवाऐं इस कद्र करने लगी है
पक्तियाँ शाख से टूटकर गिरने लगी है।

जहर घुलता जा रहा है फिजाँओ मे
कि साँस भी बार बार उखाड़ने लगी है।

मिलकर घर का बोझ उठाएं हुऐ थी
वो चार दीवारे भी अब हिलने लगी है।

चिराग अंधेरो से लड़ते रहे रात भर
रात रौशनी के साये मे पलने लगी है।

कभी मुस्कान थी,हर दिल मे भरी
अब माथे मे सलवटे पड़ने लगी है।

सारा दिन धुंध से सूरज लड़ता रहा
कि अचानक फिर शाम ढलने लगी है।

Sunday, 14 January 2018

अजब-गजब संस्कृति और दिखावा



अजब गजब संस्कृति और दिखावा

पैदा होते ही बेटा हुआ तो कुआं पूजन , बेटी हुई तो - या होई है चुडेल ।
माँ-बाप के लिए दोनो  बेटा समान , शादी होते ही  न्यारा , बडा बेटा रखेगा माँ को , छोटा बेटा बाप को , कर दिया अलग अलग , न्यारा तो एक दिन होना ही है ।
बहु घूघट मे गाली दे तो संस्कृति , घूघट ना रखकर बाप समान इज्जत दे तो , पडौसियो के ताने , क्योंकि संस्कृति ।
किसी गरीब के बच्चे के लिए 5000 रूपये पढाई के लिए देने बाला कोई नही, लेकिन नुक्ते के लिए 50000 हजार देने बाले हजारों , संस्कृति है भैया ।
अनपढ़ बेटी के लिए रिश्ता ढूंढ़ने मे पाँच साल लगा दिये , किसी की बेटी को जयपुर पढने भैज दिया तो ताने , बिगड़ जायेगी । संस्कृति ।
भैंस ने दुध नही दिया , दुध फट गया , बेटा नौकरी नही लगा , बुखार , पेट मे दर्द , अऊत , भूत , जिंद , सबका उपचार है , झाडा फूख । या फिर बालाजी के पाँच किलो घी । संस्कृति ।
आदमी दिनभर ताश खैलौ दुकान या चौराहे पर , घर मे सही ढंग की सब्जी ना बणी तो पिटाई , संस्कृति - क्योंकि बामणा का ने कही है पति परमेश्वर होता है ।
बच्चे सर्दी मे ठिठरते रहो , लेकिन बाप शाम को दारू अवश्य पियेगा । सोमरस है भैया , वेदों मे लिखा है ।
बेटा किसी की लड़की को भले घर ही ले आऔ , बेटी तो नज़र निचे करके ही जायेगी । क्योंकि संस्कृति है भैया । और फिर अपणा तो बेटा है , बेटी बाडा जाणै ।
जितना प्रचार किसी गरीब के बेटे का नौकरी लगने पर नही होता , उससे ज्यादा प्रचार 500 रूपये तीन पत्ती मे जीतने बाले का होता है ।
गरीब की लुगाई प्रसब पीडा मे मर जाये , कोई बडी बात नही । अमीर की भैंस ने दुध नही दिया , हजारों आदमी डाँक्टर बणकर पहुँच जायेंगे ।
ससुर , बहु को गाली देकर घर से निकाल देगा , कोई बडी बात नही । लेकिन बहुत ने शर्ट की जगह सिर्फ कब्जा या ब्लाउज पहन रखा है । पूरे गाँव मे प्रचार होगा । संस्कृति है ।
बूढ़े माँ-बाप को कोई रोटी मत दो , मकान से निकालकर टूटे छप्पर मे डाल दो , बच्चों की शादी के समय आनन फानन मे नहला धुलाकर समाज के सामने ढोग कर दो , बहु बेटी खूब गाली दो , कोई नही बोलेगा । लेकिन मरने पर यदि नुक्ता ना किया तो ताने देकर 10 साल बाद भी करा लेगे । संस्कृति ।
बहु यदि महाडायन है किसी ने गलती से कुछ कह दिया , कर दिया केस , दहेज का । सब गाली देणे आ जायेंगे , बिना मामले को समझे । लेकिन बहु दिनभर माँ-बाप से मीठी मीठी गाली देने पर सब चुपचाप । संस्कृति ।
भात जामणा , 30 लूगडी , 15 बेस , और 25 धौती । पहनेगा कोई नही । लेकिन भेजना जरूर पडेगा । पता सबको है ये व्यर्थ है लेकिन किसी ने बोल दिया तो - छौरा पिढ्यौ तो है पण गुण्यौ कौन । संस्कृति ।
घर मे पल्सर खडी है चलाणे के लिए , लेकिन बहु बेटी रात मे निकलती है झाडियो मे शौच के लिए । (खैर शौचालय निर्माण और इसके महत्व मे हमारा समाज बहुत आगे है इसका हमे गर्व है )
भाई के बेटों को कभी दो रूपये नही लगाये पढाई के लिए , लेकिन भाई जमीन बिकने पर , खरीदकर , पूरा श्रेय ले लेगे ,।
बडे भाईसाहब ने छौटो को पढाकर पूरी जिंदगी दाव पर लगा दी , लेकिन छोटे की लुगाई आते ही , कभी भाई बच्चों को दो रूपये ना दे सका । पत्नी व्रता नारा है भैया । खुद के भी बच्चे है ।
लड़का खुले सांड की तरह चौराहे पर लड़की छेडता हो कोई बुराई नही । लड़की ने जींस क्या पहन लिया , माँ-बाप का मरण आ गया ।
समाज मे पटेलो ने पंचायत से शादी मे dj बंद करा दिये , लेकिन दहेज खुले आम चालू रहेगा ।
किसी महिला का सुड्डा गायन फूहड हो गया , लेकिन टीबी मे चड्डी पहने हिरोईन फूहड नही शान है ।
किसी औरत का पति मर गया तो उसपर हर तरीके के इल्जाम लगाने हजारों पहुँच जायेंगे , तरह तरह की बातें करेंगे , लेकिन उसकी सहायता की बारी आई तो काम के बदले काम । वाह रे भगवान ।
माँ-बाप ने अपने खून पसीने से बेटे को दिल्ली मे अफसर बणा दिया , और बेटे ने एक पल बोल दिया - तुममे दिमाग नही है चुपचाप भगवान् का नाम लो , ।
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चाहे शब्द गलत हो ये मेघ-कलम के लेकिन भावना गलत ना हो सकती .,........
दक्षिण भारत से सिर्फ लेखन ही सही, धरातलीय समाजसेवा नही हो सकती .....,!

Wednesday, 27 December 2017

ग्रामीण बच्चों का जीवन



=== ग्राम्य जीवन ====== 

हम देहात से निकले बच्चे थे। पांचवी तक घर से तख्ती लेकर स्कूल गए थे. स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी ..
कक्षा के तनाव में स्लेटी खाकर हमनें तनाव मिटाया था। स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में घर से खाद या बोरी का कट्टा बैठने के लिए बगल में दबा कर भी ले जातें थे।.

कक्षा छः में पहली दफा हमनें अंग्रेजी का कायदा पढ़ा और पहली बार एबीसीडी देखी स्मॉल लेटर में बढ़िया एफ बनाना हमें बारहवीं तक भी न आया था। .
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हम देहात के बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया थी , कपड़े के बस्ते में किताब और कापियां लगाने का विन्यास हमारा अधिकतम रचनात्मक कौशल था। तख्ती पोतने की तन्मयता हमारी एक किस्म की साधना ही थी। हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते (नई किताबें मिलती) तब उन पर गत्ता चढ़ाना हमारे जीवन का स्थाई उत्सव था। .

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ब्लू शर्ट और खाकी पेंट में जब हम इंटरमीडिएट पहूँचे तो पहली दफा खुद के कुछ बड़े होने का अहसास हुआ। गाँव से 4-5 किलोमीटर दूर के कस्बें में साईकिल से रोज़ सुबह कतार बना कर चलना और साईकिल की रेस लगाना हमारे जीवन की अधिकतम प्रतिस्पर्धा थी। हर तीसरे दिन पंप को बड़ी युक्ति से दोनों टांगो के मध्य फंसाकर साईकिल में हवा भरतें मगर फिर भी खुद की पेंट को हम काली होने से बचा न पाते थे। स्कूल में पिटते मुर्गा बनतें मगर हमारा ईगो हमें कभी परेशान न करता
...... हम देहात के बच्चें शायद तब तक जानते नही थे कि ईगो होता क्या है ... क्लास की पिटाई का रंज अगले घंटे तक काफूर हो गया होता और हम अपनी पूरी खिलदण्डिता से हंसते पाए जाते। .
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रोज़ सुबह प्रार्थना के समय पीटी के दौरान एक हाथ फांसला लेना होता मगर फिर भी धक्का मुक्की में अड़ते भिड़ते सावधान विश्राम करते रहते। हम देहात के निकले बच्चें सपनें देखने का सलीका नही सीख पातें अपनें माँ बाप को ये कभी नही बता पातें कि हम उन्हें कितना प्यार करते है।
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हम देहात से निकले बच्चें गिरतें सम्भलतें लड़ते भिड़ते दुनिया का हिस्सा बनतें है कुछ मंजिल पा जाते है कुछ यूं ही खो जाते है। एकलव्य होना हमारी नियति है शायद।
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देहात से निकले बच्चों की दुनिया उतनी रंगीन होती वो ब्लैक एंड व्हाइट में रंग भरने की कोशिश जरूर करतें हैं। पढ़ाई फिर नौकरी के सिलसिलें में लाख शहर में रहें लेकिन हम देहात के बच्चों के अपने देहाती संकोच जीवन पर्यन्त हमारा पीछा करते है नही छोड़ पाते है..

सुड़क सुड़क की ध्वनि के साथ चाय पीना अनजान जगह जाकर रास्ता कई कई दफा पूछना। कपड़ो को सिलवट से बचाए रखना और रिश्तों को अनौपचारिकता से बचाए रखना हमें नही आता है। अपने अपने हिस्से का निर्वासन झेलते हम बुनते है कुछ आधे अधूरे से ख़्वाब और फिर जिद की हद तक उन्हें पूरा करने का जुटा लाते है आत्मविश्वास।

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हम देहात से निकलें बच्चें थोड़े अलग नही पूरे अलग होते है... अपनी आसपास की दुनिया में जीते हुए भी खुद को हमेशा पाते है थोड़ा प्रासंगिक थोड़ा अप्रासंगिक

Saturday, 18 November 2017

ये मुझे पसंद हैं....👍


1~~काशिफ़ हुसैन

याद वो उम्र भर रहेगा क्या

दिल इसी काम पर रहेगा क्या

क्या बिखर के रहेंगे ख़्वाब मिरे

आइना टूट कर रहेगा क्या

क्या हुआ अब इधर न आएगी

हब्स ये उम्र-भर रहेगा क्या

वो जो इक शख़्स मेरे अंदर है

मेरे अंदर ही मर रहेगा क्या

मैं हवा की तरह हूँ आवारा

तू मेरा हम-सफ़र रहेगा क्या

नींद उड़ती रहेगी आँखों से

जश्न ये रात-भर रहेगा क्या

2~~
नज़र मिली तो नज़ारों में बाँट दी मैं ने

ये रौशनी भी सितारों में बाँट दी मैं ने

बस एक शाम बची थी तुम्हारे हिस्से की

मगर वो शाम भी यारों में बाँट दी मैं ने



देख रहा है दरिया भी हैरानी से,
मैं ने कैसे पार किया आसानी से।।

नदी किनारे पहरों बैठा रहता हूँ,
कुछ रिश्ता है मेरा बहते पानी से।।

हर कमरे से धूप, हवा की यारी थी,
घर का नक्शा बिगड़ा है मनमानी से।।

अब जंगल में चैन से सोया करता हूँ,
डर लगता था बचपन में वीरानी से।।

दिल पागल है रोज़ पशीमाँ होता है,
फिर भी बाज़ नहीं आता मनमानी से।।
sUkH

Friday, 11 August 2017

My sad story (Update: Now Happy Story) / Struggle of Sukhdev Meena Bainada

11-08-2017

I'm sUkHdEv mEeNa.....

I don't have a success story but a sad story which is still incomplete because people say every sad beginning has a beautiful end 

1.SSC CHSL 2012- failed in exam

2.SSC CGL 2012- failed in prelims

3.JAIL PRAHARI 2012- physical didn't attend

4.SSC CGL 2013 -failed in prelims

5.SSC CGL 2013 (Re-Exam) -failed in mains

6.SSC CHSL 2013- failed in exam

7.SSC CGL 2014- failed in mains

8.SSC CHSL 2014- failed in exam

9.IBPS Clerk & PO 2014- failed in prelims

10.SSC CPO 2015- physical didn't attend

11.SSC CGL 2015- failed in mains 

12.SSC CHSL 2015- waiting for final result

13.IBPS Clerk & PO 2015- failed in mains 

14.SBI PO 2015- failed in mains

15.LIC ADO 2015 -interview didn't attend

16.FCI 2015- failed in exam

17.RRB NTPC 2015- waiting for final result

18.SSC CPO 2016 -failed in physical

19.SSC CGL 2016 -failed in final merit

20.SSC CHSL 2016- waiting for main's result

21. IBPS Clerk 2016- in Reserve list

update:08Jan2025 01:04am

22. RRB NTPC 2015- SELECTED (Station Master)-Not Joined

23. DMRC 2016- SELECTED (CRA) [ Promoted to station controller on 21 April 2025 ]

24. SSC CHSL 2016- SELECTED (PA/SA)-Not Joined

25. RSMSSB PATWARI 2016- SELECTED-Not Joined

I have seen a lot of failure

Some people call me a failure

Some time I get annoy 
But still somewhere in my heart I know I am not a failure
I am still fighting
I have not give up yet
Yes I fear of losing 
But still fighting
Because I know one day I will make it 
I will shut all those mouths who questioned my potential
My story is still incomplete
May be good is choosing a beautiful climax for it. 
I m hopeful and I am ready 
CGL 2017 is approaching 
May be this is my destiny...

update:08Jan2025 01:23am

i appeared in CGL-17 pre examination and qualify but didn't go to write mains exam bcz that time i was not Berojgaar and already joined DMRC as CRA in feb2018 and my training was going on. after that i didn't appear in any examination. Now i'm happy with my decision. currently i'm living in Model Town Delhi with my wife and son. Today my salary is 95k+ and distance from my hometown is only 270km

Hobby: Travelling like a backpacker in Nomadic style

state/ut/country have been explored till the date: (Leh-ladakh, J&K, Himachal, Uttrakhand, Haryana, Delhi, Rajasthan, UP, MP, Sikkim, Gujrat, Goa, Tamilnadu)

{India, Vietnam, Thailand, Singapore, Kazakhstan} 

My Instagram: @Nomad_sukhi 

God bless me...😃😃

📚📓📒📃🗞📑📙📚🤗😐😎

Saturday, 29 April 2017

दोस्त और यादें

*Harivansh Rai Bachhan's poem on FRIENDSHIP :*
_________________________________
....मै यादों का
    किस्सा खोलूँ तो,
    कुछ दोस्त बहुत
    याद आते हैं....
...मै गुजरे पल को सोचूँ
   तो, कुछ दोस्त
   बहुत याद आते हैं....

_...अब जाने कौन सी नगरी में,_
_...आबाद हैं जाकर मुद्दत से...._
....मै देर रात तक जागूँ तो ,
    कुछ दोस्त
    बहुत याद आते हैं....
....कुछ बातें थीं फूलों जैसी,
....कुछ लहजे खुशबू जैसे थे,
....मै शहर-ए-चमन में टहलूँ तो,
....कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं.
_...सबकी जिंदगी बदल गयी,_
_...एक नए सिरे में ढल गयी,_
_...किसी को नौकरी से फुरसत नही..._
_...किसी को दोस्तों की जरुरत नही...._
_...सारे यार गुम हो गये हैं..._
...."तू" से "तुम" और "आप" हो गये है....
....मै गुजरे पल को सोचूँ
    तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं....
_...धीरे धीरे उम्र कट जाती है..._
_...जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है,_
_...कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है..._
  _और कभी यादों के सहारे ज़िन्दगी कट जाती है ..._
....किनारो पे सागर के खजाने नहीं आते,
....फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते...
_....जी लो इन पलों को हस के दोस्त,_
    _फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं आते ...._
*....हरिवंशराय बच्चन*

हर रोज़ गिर कर भी मुकमल खड़े है 😊 देख ज़िंदगी मेरे होंसले तुझसे भी बड़े हैं 😎


Saturday, 15 April 2017

आजकल थोड़ा अपसेट हूँ। 🙃🙁☹

रिश्तें निभाना हर किसी के बस की बात नहीं,
खुद को तोड़ा है कई बार मैंने किसी और को बनाने के लिए !!
👉👉👉👇👇👇😎😔😨😢

गलतियों से जुदा तू भी नहीं मैं भी नहीं,
दोनों इंसान है, खुदा तू भी नहीं मैं भी नहीं;
तू मुझे और मैं तुझे इलज़ाम देते हैं मगर,
अपने अंदर झाँकता, तू भी नहीं मैं भी नहीं;
गलतफहमियों ने कर दी दोनों में पैदा दूरियाँ,
वरना फितरत का बुरा तू भी नहीं मैं भी नहीं;
अपने अपने रास्तों पे दोनों का सफ़र जारी रहा,
एक पल को रुका तू भी नहीं मैं भी नहीं;
चाहते दोनों बहुत एक दुसरे को है मगर,
ये हकीकत मानता तू भी नहीं मैं भी नहीं.......!!!!

(उम्मीद करता हूँ जिनके लिए लिखा है वो समझ गए होंगे)

Tuesday, 11 October 2016

आपको याद है:साँझी

छोरी माट्टी ल्याया करती
मुह अर हाथ बणाया करती
गोबर तै चिपकाया करती
नू सांझी बणाया करती
कंठी कड़ूले पहराया करती
आखं मै स्याही लाया करती
चूंदड़ भी उढाया करती
नू सांझी नै सजाया करती
रोज सांझ नै आया करती
गीत संझा के गाया करती
घी मै मिट्ठा मिलाया करती
नूं सांझी नै जीमाया करती
सांझी का फेर आया भाई
अगड़ पड़ोसन देखण आई
कट्ठी होकै बूझै लुगाई
सांझी तेरे कितने भाई
फेर सांझी की होई विदाई
छोरी छारी घालण आई
हांडी के म्हा सांझी बैठाई
गैल्या उसका करदिया भाई
छोरी मिलकै गाया करती
हांडी नै सजाया करती
एक दीवा भी जलाया करती
फेर जोहड़ मै तिराया करती
हम भी गैल्या जाया करते
जोहड़ मै डल़े बगाया करते
सांझी नै सताया करते
फोड़ कै हांडी आया करते
ईब गया जब गाम मै भाई
सिमेंट टाईल अर नई पुताई
सारी भीत चमकती पाई
पर कितै ना दिखी सांझी माई
...कितै ना दिखी सांझी माइ 

Wednesday, 28 September 2016

जब तक तोडे़ंगे नही, तब तक छोडे़ंगे नही

मँज़िले बड़ी ज़िद्दी होती हैँ ,
हासिल कहाँ नसीब से होती हैं !
मगर वहाँ तूफान भी हार जाते हैं ,
जहाँ कश्तियाँ ज़िद पर होती हैँ !
जीत निश्चित हो तो,
कायर भी जंग लड़ लेते है !
बहादुर तो वो लोग है ,
जो हार निश्चित हो फिर भी मैदान नहीं छोड़ते !
भरोसा अगर " ईश्वर " पर है,
तो जो लिखा है तकदीर में, वो ही पाओगे !
मगर , भरोसा यदि " खुद " पर है ,
तो ईश्वर वही लिखेगा , जो आप चाहोगे !!
SUKHDEV BAINADA
+918561035806

Sunday, 18 September 2016

क्या यही जिन्दगी है ???

जीवन के *20* साल हवा की तरह उड़ गए । फिर शुरू हुई *नोकरी* की खोज । ये नहीं वो , दूर नहीं पास । ऐसा करते करते *2 .. 3* नोकरियाँ छोड़ने एक तय हुई। थोड़ी स्थिरता की शुरुआत हुई।

फिर हाथ आया पहली तनख्वाह का *चेक*। वह *बैंक* में जमा हुआ और शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले *शून्यों* का अंतहीन खेल। *2- 3* वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और *शून्य* बढ़ गए। उम्र *27* हो गयी।

और फिर *विवाह* हो गया। जीवन की *राम कहानी* शुरू हो गयी। शुरू के *2 ..  4* साल नर्म , गुलाबी, रसीले , सपनीले गुजरे । हाथो में हाथ डालकर घूमना फिरना, रंग बिरंगे सपने। *पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए*।

और फिर *बच्चे* के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में *पालना* झूलने लगा। अब सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना - बैठना, खाना - पीना, लाड - दुलार ।

समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला।
*इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, बाते- करना घूमना - फिरना कब बंद हो गया दोनों को पता ही न चला*।

*बच्चा* बड़ा होता गया। वो *बच्चे* में व्यस्त हो गयी, मैं अपने *काम* में । घर और गाडी की *क़िस्त*, बच्चे की जिम्मेदारी, शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में *शुन्य* बढाने की चिंता। उसने भी अपने आप काम में पूरी तरह झोंक दिया और मेने भी....

इतने में मैं *37* का हो गया। घर, गाडी, बैंक में *शुन्य*, परिवार सब है फिर भी कुछ कमी है ? पर वो है क्या समझ नहीं आया। उसकी चिड चिड बढती गयी, मैं उदासीन होने लगा।

इस बीच दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चा बड़ा होता गया। उसका खुद का संसार तैयार होता गया। कब *10वि*   *anniversary*आई और चली गयी पता ही नहीं चला। तब तक दोनों ही *40 42* के हो गए। बैंक में *शुन्य* बढ़ता ही गया।

एक नितांत एकांत क्षण में मुझे वो *गुजरे* दिन याद आये और मौका देख कर उस से कहा " अरे जरा यहाँ आओ, पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कही घूम के आते हैं।"

उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और कहा कि " *तुम्हे कुछ भी सूझता* *है यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे* *बातो की सूझ रही है*।"
कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी।

तो फिर आया *पैंतालिसवा* साल, आँखों पर चश्मा लग गया, बाल काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझने शुरू हो गयी।

बेटा उधर कॉलेज में था, इधर बैंक में *शुन्य* बढ़ रहे थे। देखते ही देखते उसका *कॉलेज* ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़ा हो गया। उसके पंख फूटे और उड़ गया *परदेश*।

उसके *बालो का काला* रंग भी उड़ने लगा। कभी कभी दिमाग साथ छोड़ने लगा। उसे *चश्मा* भी लग गया। मैं खुद *बुढा* हो गया। वो भी *उमरदराज* लगने लगी।

दोनों *55* से *60* की और बढ़ने लगे। बैंक के *शून्यों* की कोई खबर नहीं। बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।

अब तो *गोली दवाइयों* के दिन और समय निश्चित होने लगे। *बच्चे* बड़े होंगे तब हम *साथ* रहेंगे सोच कर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। *बच्चे* कब *वापिस* आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।

एक दिन यूँ ही सोफे पे बेठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वो दिया बाती कर रही थी। तभी *फोन* की घंटी बजी। लपक के *फोन* उठाया। *दूसरी तरफ बेटा था*। जिसने कहा कि उसने *शादी* कर ली और अब *परदेश* में ही रहेगा।

उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के *शून्यों* को किसी *वृद्धाश्रम* में दे देना। और *आप भी वही रह लेना*। कुछ और ओपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।

मैं पुन: सोफे पर आकर बेठ गया। उसकी भी पूजा ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी *"चलो आज फिर हाथो में हाथ लेके बात करते हैं*"
*वो तुरंत बोली " अभी आई"।*

मुझे विश्वास नहीं हुआ। *चेहरा ख़ुशी से चमक उठा*। आँखे भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए । अचानक आँखों की *चमक फीकी* पड़ गयी और मैं *निस्तेज* हो गया। हमेशा के लिए !!

उसने शेष पूजा की और मेरे पास आके बैठ गयी " *बोलो क्या बोल रहे थे*?"

लेकिन मेने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल *ठंडा* पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था।

क्षण भर को वो शून्य हो गयी।
" *क्या करू*? "

उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन *एक दो* मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। *इश्वर को प्रणाम किया*। और फिर से आके सोफे पे बैठ गयी।

मेरा *ठंडा हाथ* अपने हाथो में लिया और बोली
" *चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे* ? *क्या बातें करनी हैं तुम्हे*?" *बोलो* !!

ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !!......
वो एकटक मुझे देखती रही। *आँखों से अश्रु धारा बह निकली*। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था।

*क्या ये ही जिन्दगी है ? ?*

सब अपना नसीब साथ लेके आते हैं इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो । जीवन अपना है तो जीने के तरीके भी अपने रखो। शुरुआत आज से करो। क्यूंकि कल कभी नहीं आएगा।
#सुखदेव बैनाड़ा

Saturday, 17 September 2016

महकेगी जिंदगी

��हो सके तो मुस्कुराहट बांटिये, रिश्तों में कुछ सरसराहट बांटिये !

नीरस सी हो चली है ज़िन्दगी बहुत, थोड़ी सी इसमें शरारत बांटिये !

जहाँ भी देखो ग़म पसरा है, आँसू हैं, थोड़ी सी रिश्तों में हरारत बांटिये !

नहीं पूछता कोई भी ग़म एक - दूजे का, लोगों में थोड़ी सी ज़ियारत बांटिये !

सब भाग रहे हैं यूँ ही एक - दूजे के पीछे, अब सुकून की कोई इबादत बांटिये !

जीने का अंदाज़ न जाने कहाँ खो गया, नफ़रत छोड़ प्यार प्रेम बांटिये !

ज़िन्दगी न बीत जाये यूँ ही दुख-दर्द में, बेचैनियों को कुछ तो राहत बांटिये !!

❣ ये ज़िन्दगी ना मिलेगी दुबारा ❣
..........सुखदेव मीणा बैनाड़ा

Tuesday, 13 September 2016

कभी हमारे पास भी जहाज थे!.....

जरूर पढ़ना.......
*कभी हम भी.. बहुत अमीर हुआ करते थे* *हमारे भी जहाज.. चला करते थे।*
*हवा में.. भी।*
*पानी में.. भी।*
*दो दुर्घटनाएं हुई।*
*सब कुछ.. ख़त्म हो गया।*
*पहली दुर्घटना*
जब क्लास में.. हवाई जहाज उड़ाया।
टीचर के सिर से.. टकराया।
स्कूल से.. निकलने की नौबत आ गई।
बहुत फजीहत हुई।
कसम दिलाई गई।
औऱ जहाज बनाना और.. उडाना सब छूट गया।
*दूसरी दुर्घटना*
बारिश के मौसम में, मां ने.. अठन्नी दी।
चाय के लिए.. दूध लाना था।कोई मेहमान आया था।
हमने अठन्नी.. गली की नाली में तैरते.. अपने जहाज में.. बिठा दी।
तैरते जहाज के साथ.. हम शान से.. चल रहे थे।
ठसक के साथ।
खुशी खुशी।
अचानक..
तेज बहाब आया।
और..
जहाज.. डूब गया।
साथ में.. अठन्नी भी डूब गई।
ढूंढे से ना मिली।
मेहमान बिना चाय पीये चले गये।
फिर..
जमकर.. ठुकाई हुई।
घंटे भर.. मुर्गा बनाया गया।
औऱ हमारा.. पानी में जहाज तैराना भी.. बंद हो गया।
आज जब.. प्लेन औऱ क्रूज के सफर की बातें चलती हैं , तो.. उन दिनों की याद दिलाती हैं।
वो भी क्या जमाना था !
और..
आज के जमाने में..
मेरे बेटी ने...
पंद्रह हजार का मोबाइल गुमाया तो..
मां बोली ~ कोई बात नहीं ! पापा..
दूसरा दिला देंगे।
हमें अठन्नी पर.. मिली सजा याद आ गई।
फिर भी आलम यह है कि.. आज भी.. हमारे सर.. मां-बाप के चरणों में.. श्रद्धा से झुकते हैं।
औऱ हमारे बच्चे.. 'यार पापा ! यार मम्मी !
कहकर.. बात करते हैं।
हम प्रगतिशील से.. प्रगतिवान.. हो गये हैं।
कोई लौटा दे.. मेरे बीते हुए दिन।।
‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍
माँ बाप की लाइफ गुजर जाती है *बेटे
की लाइफ बनाने में......*
और बेटा status_ रखता है---
"*My wife is my Life*" या My love is my life

Monday, 12 September 2016

जीत पक्की है|

✨ *जीत पक्की है* ✨

कुछ करना है, तो डटकर चल।
           *थोड़ा दुनियां से हटकर चल*।
लीक पर तो सभी चल लेते है,
      *कभी इतिहास को पलटकर चल*।
बिना काम के मुकाम कैसा?
          *बिना मेहनत के, दाम कैसा*?
जब तक ना हाँसिल हो मंज़िल
        *तो राह में, राही आराम कैसा*?
अर्जुन सा, निशाना रख, मन में,
          *ना कोई बहाना रख*।
जो लक्ष्य सामने है, 
बस उसी पे अपना ठिकाना रख।
          *सोच मत, साकार कर*,
अपने कर्मो से प्यार कर।
          *मिलेंगा तेरी मेहनत का फल*,
किसी और का ना इंतज़ार कर।
    *जो चले थे अकेले*
       *उनके पीछे आज मेले हैं*।
    जो करते रहे इंतज़ार उनकी
  जिंदगी में आज भी झमेले है!


Saturday, 3 September 2016

बाबासाहेब का संदेश

����
सुन ऐ नादाँ, मुझे भी कोई
दौलत की कमी नही होती,
अगर मुझको तेरे सम्मान
की कोई फिकर नही होती!
गगन को चूम रहा होता,
मेरा भी ऊंचा सा बंगला,
लड़ाई जो तेरे हकों की,
मैने कभी लड़ी नही होती!
जिये होती मेरी भी औलादें,
ऐश और आराम का जीवन,
तेरे बच्चो की खुशियो की,
कहानी जो लिखी नही होती!
छपी होती मेरी भी तस्वीरें,
कागज़ो के इन टुकड़ो पर,
तेरी खातिर जो मनुओ से,
दुश्मनी मैने करी नही होती!
जहां चाहत थी आज़ादी की,
बही नदियों से खून की धारा,
कद्र होती आजादी की तुझे,
जो बैठे-बैठे न मिली होती!
बड़ा अफसोस है कि मेरा,
रह गया अधूरा इक सपना,
जो मेरी औलादो ने मिलकर,
मेरी नीलामी की नही होती!
✊��क्रांतिकारी जय भीम

Friday, 2 September 2016

मेहनत रंग लायेगी

उम्मीद है कि दीन - दुनिया को भुलाकर आप पूरी मेहनत से पढ़ रहे होंगे । आपके लिये 5 गुणा 7 के घरौंदे मे ही पूरा विश्व समाया रहता है , तिस पर भी आप उसमे ग्लोब भी अमवा देते है । आपके लिये भारत और विश्व का मानचित्र ही कैटरीना और ऐंजेलिना जोली होता है ।
कूकर की सीटियां भी धीरे - धीरे अपनी आवाज़ खो देती है , लेकिन आपकी जद्दोजहद जारी रहती है । सिलेंडर को उल्टा करके गैस निकालने की जो दुर्लभ कला आपको आती है , उस पर स्वीडिश अकेडमी देर - सबेर आपको नोबेल से भी नवाजेगा ।
फ़िर भी आप लोगों के मांझी वाले धैर्य को कुचलने के लिये कुछ पुराने चावल एक मुहिम छेड़े रहते है ।जो आपसे कहते है कि ये एक लम्बी साधना है , ये आपका बहुत समय लेगी । मेरी आपसे गुजारिश है कि उन ALL INDIA FRUSTRATED UNION के सदस्यों को सादर प्रणाम करते हुए उनकी सलाह को 'स्वच्छ भारत अभियान ' वाले कूडे के ढेर मे डाल दिया करिये ।
आपके माँ - बाप ने अनेकों जतन से आपको इस मुकाम तक पहुँचाया है । खुद 5 किलोमीटर धूप मे पैदल चलकर बाजार जाने वाले वे महापुरुष आपको फोन पर ये कहते है कि बेटा ऑटो से जाना वरना लू लग जायेगी ।नोकिया 1108 चलाकर आपको सैमसंग गैलेक्सी ग्रांड दिलवाते है ।अपनी आँखो से भी आपके लिये सपने देखते है ।
तो प्लीज़ उन आँखो के सपनो को दफन मत होने देना । और मुस्कराते हुए कहना कि "जब तक तोडेंगे नही तब.तक छोडेंगे नही "।

जय भीम: जय भारत

बहुत हो चुकी है बर्बादी l
सोच भुला दो अब मनुवादी ll
मंदिर और शिवालय छोड़ो l
विद्यालय से नाता जोड़ो ll
संविधान को सब अपनाओ l
बाबा की धुनि मे धुनि लाओ ll
बाबा ने उपहार दिये हैं l
जीने के अधिकार दिये हैं ll
नारी को सम्मान दिया है l
भारत को संविधान दिया है ll
भाषण की आजादी दी है ।
आरक्षण व खादी दी है ll
हम बाबा को भूल गये हैं l
अपने मद मे झूल गये हैं ll
भीम मिशन से मुख मोड़े हैं l
बाबा के सपने तोड़े हैं ll
हम कितने खुद कामी निकले l
कितने नमक हरामी निकले ll
बाबा ने थी जॉब दिलायी l
हमने रामायण पढ़वायी ll
अमरनाथ यात्रा कर आये l
घर में वामन खूब जिमाये ll
घूम के आये वैष्णों माता l
घर पर करवाया जगराता ll
हर महीना गंगा पर जाते l
हर पूर्णिमा हवन कराते ll
हाथ कलावा बांधे फिरते l
लंम्बा तिलक लगाके चलते ll
सत्संगों मे लुटने जाते l
मंदिर में हैं धक्के खाते ll
ये अपनों को भूल गये हैं l
खुदगर्जी मे झूल गये हैं ll
पाखंडो से नाता तोड़ो l
बौद्ध धम्म से खुद को जोड़ो ll
बच्चों को अच्छी शिक्षा दो l
उनको बौद्धधम्म दीक्षा दो ll
आधिकारों को लड़ना सीखो l
अब दुश्मन से भिड़ना सीखो ll
शेरों से दुनिया डरती है l
बकरों पर छूरी चलती है ll
अब शेरों साहस दिखा दो l
अपना भी इतिहास बना दो ll
भीम मिशन साकार बना दो l
दिल्ली में सरकार बना दो ll
जय भीम जय भारत

Wednesday, 31 August 2016

किसान: ईक दु:ख भरी दास्तां

कहते हैं......

इन्सान सपना देखता है
तो वो ज़रूर पूरा होता है.

मगर
किसान के सपने
कभी पूरे नहीं होते
बड़े अरमान और कड़ी मेहनत से फसल तैयार करता है और जब तैयार हुई फसल को बेचने मंडी जाता है.

बड़ा खुश होते हुए जाता है.

बच्चों से कहता है
आज तुम्हारे लिये नये कपड़े लाऊंगा फल और मिठाई भी लाऊंगा,

पत्नी से कहता है..
तुम्हारी साड़ी भी कितनी पुरानी हो गई है फटने भी लगी है आज एक साड़ी नई लेता आऊंगा.
पत्नी:–”अरे नही जी..!”
“ये तो अभी ठीक है..!”
“आप तो अपने लिये
जूते ही लेते आना कितने पुराने हो गये हैं और फट भी तो गये हैं..!”

जब
किसान मंडी पहुँचता है .

ये उसकी मजबूरी है
वो अपने माल की कीमत खुद नहीं लगा पाता.

व्यापारी
उसके माल की कीमत
अपने हिसाब से तय करते हैं.

एक
साबुन की टिकिया पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.

एक
माचिस की डिब्बी पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.

लेकिन किसान
अपने माल की कीमत खु़द नहीं कर पाता .

खैर..
माल बिक जाता है,
लेकिन कीमत
उसकी सोच अनुरूप नहीं मिल पाती.

माल तौलाई के बाद
जब पेमेन्ट मिलता है.

वो सोचता है
इसमें से दवाई वाले को देना है, खाद वाले को देना है, मज़दूर को देना है ,

अरे हाँ,
बिजली का बिल
भी तो जमा करना है.

सारा हिसाब
लगाने के बाद कुछ बचता ही नहीं.

वो मायूस हो
घर लौट आता है
बच्चे उसे बाहर ही इन्तज़ार करते हुए मिल जाते हैं.

“पिताजी..! पिताजी..!” कहते हुये उससे लिपट जाते हैं और पूछते हैं:-
“हमारे नये कपडे़ नहीं ला़ये..?”

पिता:–”वो क्या है बेटा..,
कि बाजार में अच्छे कपडे़ मिले ही नहीं,
दुकानदार कह रहा था
इस बार दिवाली पर अच्छे कपडे़ आयेंगे तब ले लेंगे..!”

पत्नी समझ जाती है, फसल
कम भाव में बिकी है,
वो बच्चों को समझा कर बाहर भेज देती है.

पति:–”अरे हाँ..!”
“तुम्हारी साड़ी भी नहीं ला पाया..!”

पत्नी:–”कोई बात नहीं जी, हम बाद में ले लेंगे लेकिन आप अपने जूते तो ले आते..!”

पति:– “अरे वो तो मैं भूल ही गया..!”

पत्नी भी पति के साथ सालों से है पति का मायूस चेहरा और बात करने के तरीके से ही उसकी परेशानी समझ जाती है
लेकिन फिर भी पति को दिलासा देती है .

और अपनी नम आँखों को साड़ी के पल्लू से छिपाती रसोई की ओर चली जाती है.

फिर अगले दिन
सुबह पूरा परिवार एक नयी उम्मीद ,
एक नई आशा एक नये सपने के साथ नई फसल की तैयारी के लिये जुट जाता है.
….

ये कहानी
हर छोटे और मध्यम किसान की ज़िन्दगी में हर साल दोहराई जाती है
…..

हम ये नहीं कहते
कि हर बार फसल के
सही दाम नहीं मिलते,

लेकिन
जब भी कभी दाम बढ़ें, मीडिया वाले कैमरा ले के मंडी पहुच जाते हैं और खबर को दिन में दस दस बार दिखाते हैं.

कैमरे के सामने शहरी महिलायें हाथ में बास्केट ले कर अपना मेकअप ठीक करती मुस्कराती हुई कहती हैं..
सब्जी के दाम बहुत बढ़ गये हैं हमारी रसोई का बजट ही बिगड़ गया.
………

कभी अपने बास्केट को कोने में रख कर किसी खेत में जा कर किसान की हालत तो देखिये.

वो किस तरह
फसल को पानी देता है.

१५ लीटर दवाई से भरी हुई टंकी पीठ पर लाद कर छिङ़काव करता है,

२० किलो खाद की
तगाड़ी उठा कर खेतों में घूम-घूम कर फसल को खाद देता है.

अघोषित बिजली कटौती के चलते रात-रात भर बिजली चालू होने के इन्तज़ार में जागता है.

चिलचिलाती धूप में
सिर का पसीना पैर तक बहाता है.

ज़हरीले जन्तुओं
का डर होते भी
खेतों में नंगे पैर घूमता है.
……

जिस दिन
ये वास्तविकता
आप अपनी आँखों से
देख लेंगे, उस दिन आपके
किचन में रखी हुई सब्ज़ी, प्याज़, गेहूँ, चावल, दाल, फल, मसाले, दूध
सब सस्ते लगने लगेंगे.
तभी आप एक मज़दूर और किसान का दर्द समझ सकेंगे।

।। जय जवान जय किसान ||