Saturday, 11 August 2018

आज मौसम सुहाना है...👍

किताबे-शौक़ में क्या-क्या निशानियाँ रख दीं
कहीं पे फूल, कहीं हमने तितलियाँ रख दीं।

कभी मिलेंगी जो तनहाइयाँ तो पढ़ लेंगे
छुपाके हमने कुछ ऐसी कहानियाँ रख दीं।

यही कि हाथ हमारे भी हो गए ज़ख़्मी
गुलों के शौक में काँटों पे उंगलियाँ रख दीं।

Friday, 10 August 2018

मेरे अजनबी हमसफ़र


मेरे अजनबी हमसफ़र.... sUkHdEv

वो ट्रेन के रिजर्वेशन के डब्बे में बाथरूम के तरफ वाली सीट पर बैठी थी..

. उसके चेहरे से पता चल रहा था कि थोड़ी सी घबराहट है उसके दिल में कि कहीं टीटी ने आकर पकड़ लिया तो..कुछ देर तक तो पीछे पलट-पलट कर टीटी के आने का इंतज़ार करती रही।

शायद सोच रही थी कि थोड़े बहुत पैसे देकर कुछ निपटारा कर लेगी।

देखकर यही लग रहा था कि जनरल डब्बे में चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें आकर बैठ गयी, शायद ज्यादा लम्बा सफ़र भी नहीं करना होगा। सामान के नाम पर उसकी गोद में रखा एक छोटा सा बेग दिख रहा था।

मैं बहुत देर तक कोशिश करता रहा पीछे से उसे देखने की कि शायद चेहरा सही से दिख पाए लेकिन हर बार असफल ही रहा...फिर थोड़ी देर बाद वो भी खिड़की पर हाथ टिकाकर सो गयी। और मैं भी वापस से अपनी किताब पढ़ने में लग गया...

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लगभग 1 घंटे के बाद टीटी आया और उसे हिलाकर उठाया।
“कहाँ जाना है बेटा”

“अंकल दिल्ली तक जाना है”

“टिकट है ?”

“नहीं अंकल …. जनरल का है ….लेकिन वहां चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें बैठ गयी”

“अच्छा 300 रुपये का पेनाल्टी बनेगा”

“ओह …अंकल मेरे पास तो लेकिन 100 रुपये ही हैं”

“ये तो गलत बात है बेटा …..पेनाल्टी तो भरनी पड़ेगी”

“सॉरी अंकल …. मैं अलगे स्टेशन पर जनरल में चली जाउंगी …. मेरे पास सच में पैसे नहीं हैं …. कुछ परेशानी आ गयी, इसलिए जल्दबाजी में घर से निकल आई … और ज्यादा पैसे रखना भूल गयी….” बोलते बोलते वो लड़की रोने लगी टीटी उसे माफ़ किया और 100 रुपये में उसे दिल्ली तक उस डब्बे में बैठने की परमिशन देदी।
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टीटी के जाते ही उसने अपने आँसू पोंछे और इधर-उधर देखा कि कहीं कोई उसकी ओर देखकर हंस तो नहीं रहा था.
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.थोड़ी देर बाद उसने किसी को फ़ोन लगाया और कहा कि उसके पास बिलकुल भी पैसे नहीं बचे हैं …

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दिल्ली स्टेशन पर कोई जुगाड़ कराके उसके लिए पैसे भिजा दे, वरना वो समय पर गाँव नहीं पहुँच पायेगी।

. मेरे मन में उथल-पुथल हो रही थी, न जाने क्यूँ उसकी मासूमियत देखकर उसकी तरफ खिंचाव सा महसूस कर रहा था, दिल कर रहा था कि उसे पैसे दे दूं और कहूँ कि तुम परेशान मत हो … और रो मत ….
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लेकिन एक अजनबी के लिए इस तरह की बात सोचना थोडा अजीब था। उसकी शक्ल से लग रहा था कि उसने कुछ खाया पिया नहीं है शायद सुबह से … और अब तो उसके पास पैसे भी नहीं थे।

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बहुत देर तक उसे इस परेशानी में देखने के बाद मैं कुछ उपाय निकालने लगे जिससे मैं उसकी मदद कर सकूँ और फ़्लर्ट भी ना कहलाऊं।

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फिर मैं एक पेपर पर नोट लिखा,“बहुत देर से तुम्हें परेशान होते हुए देख रहा हूँ, जानता हूँ कि एक अजनबी हम उम्र लड़के का इस तरह तुम्हें नोट भेजना अजीब भी होगा और शायद तुम्हारी नज़र में गलत भी, लेकिन तुम्हे इस तरह परेशान देखकर मुझे बैचेनी हो रही है इसलिए यह 500 रुपये दे रहा हूँ , तुम्हे कोई अहसान न लगे इसलिए मेरा एड्रेस भी लिख रहा हूँ …...

.जब तुम्हें सही लगे मेरे एड्रेस पर पैसे वापस भेज सकती हो …. वैसे मैं नहीं चाहूँगा कि तुम वापस करो …
.. अजनबी हमसफ़र ”
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एक चाय वाले के हाथों उसे वो नोट देने को कहा, और चाय वाले को मना किया कि उसे ना बताये कि वो नोट मैंने उसे भेजा है।
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नोट मिलते ही उसने दो-तीन बार पीछे पलटकर देखा कि कोई उसकी तरह देखता हुआ नज़र आये तो उसे पता लग जायेगा कि किसने भेजा।
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लेकिन मैं तो नोट भेजने के बाद ही मुँह पर चादर डालकर लेट गया था...थोड़ी देर बाद चादर का कोना हटाकर देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कराहट महसूस की।
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लगा जैसे कई सालों से इस एक मुस्कराहट का इंतज़ार था। उसकी आखों की चमक ने मेरा दिल उसके हाथों में जाकर थमा दिया ….

फिर चादर का कोना हटा- हटा कर हर थोड़ी देर में उसे देखकर जैसे सांस ले रहा था मैं..
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.पता ही नहीं चला कब आँख लग गयी। जब आँख खुली तो वो वहां नहीं थी … ट्रेन दिल्ली स्टेशन पर ही रुकी थी। और उस सीट पर एक छोटा सा नोट रखा था ….. मैं झटपट मेरी सीट से उतरकर उसे उठा लिया ...

और उस पर लिखा था … Thank You मेरे अजनबी हमसफ़र …..आपका ये अहसान मैं ज़िन्दगी भर नहीं भूलूँगी …..
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मेरी माँ आज मुझे छोड़कर चली गयी हैं …. घर में मेरे अलावा और कोई नहीं है इसलिए आनन – फानन में घर जा रही हूँ। आज आपके इन पैसों से मैं अपनी माँ को शमशान जाने से पहले एक बार देख पाऊँगी …..
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उनकी बीमारी की वजह से उनकी मौत के बाद उन्हें ज्यादा देर घर में नहीं रखा जा सकता। आज से मैं आपकी कर्ज़दार हूँ ….जल्द ही आपके पैसे लौटा दूँगी। उस दिन से उसकी वो आँखें और वो मुस्कराहट जैसे मेरे जीने की वजह थे ….
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. हर रोज़ पोस्टमैन से पूछता था शायद किसी दिन उसका कोई ख़त आ जाये ….
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. आज 1 साल बाद एक ख़त मिला ….आपका क़र्ज़ अदा करना चाहती हूँ …. लेकिन ख़त के ज़रिये नहीं आपसे मिलकर … नीचे मिलने की जगह का पता लिखा था …. और आखिर में लिखा था ...
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. तुम्हारी अजनबी हमसफ़र ……

Friday, 20 April 2018

प्यार-शादी :- तलाक़

तब मैं जनसत्ता में नौकरी करता था। एक दिन खबर
आई कि एक आदमी ने झगड़ा के बाद
अपनी पत्नी की हत्या कर
दी। मैंने खब़र में हेडिंग लगाई कि पति ने
अपनी बीवी को मार डाला।
खबर छप गई। किसी को आपत्ति नहीं
थी। पर शाम को दफ्तर से घर के लिए निकलते हुए
प्रधान संपादक प्रभाष जोशी जी
सीढ़ी के पास मिल गए। मैंने उन्हें
नमस्कार किया तो कहने लगे कि संजय जी, पति
की बीवी नहीं
होती।
“पति की बीवी
नहीं होती?” मैं चौंका था।
“बीवी तो शौहर की
होती है, मियां की होती है।
पति की तो पत्नी होती है।”
भाषा के मामले में प्रभाष जी के सामने मेरा टिकना
मुमकिन नहीं था। हालांकि मैं कहना चाह रहा था कि
भाव तो साफ है न ? बीवी कहें या
पत्नी या फिर वाइफ, सब एक ही तो हैं।
लेकिन मेरे कहने से पहले ही उन्होंने मुझसे कहा कि
भाव अपनी जगह है, शब्द अपनी
जगह। कुछ शब्द कुछ जगहों के लिए बने ही
नहीं होते, ऐसे में शब्दों का घालमेल
गड़बड़ी पैदा करता है।
प्रभाष जी आमतौर पर उपसंपादकों से लंबी
बातें नहीं किया करते थे। लेकिन उस दिन उन्होंने मुझे
टोका था और तब से मेरे मन में ये बात बैठ गई थी कि
शब्द बहुत सोच समझ कर गढ़े गए होते हैं।
खैर, आज मैं भाषा की कक्षा लगाने नहीं
आया। आज मैं रिश्तों के एक अलग अध्याय को जीने
के लिए आपके पास आया हूं। लेकिन इसके लिए आपको मेरे साथ
निधि के पास चलना होगा।
निधि मेरी दोस्त है। कल उसने मुझे फोन करके अपने
घर बुलाया था। फोन पर उसकी आवाज़ से मेरे मन में
खटका हो चुका था कि कुछ न कुछ गड़बड़ है। मैं शाम को उसके
घर पहुंचा। उसने चाय बनाई और मुझसे बात करने
लगी। पहले तो इधर-उधर की बातें हुईं,
फिर उसने कहना शुरू कर दिया कि नितिन से उसकी
नहीं बन रही और उसने उसे तलाक देने
का फैसला कर लिया है।
मैंने पूछा कि नितिन कहां है, तो उसने कहा कि अभी
कहीं गए हैं, बता कर नहीं गए। उसने
कहा कि बात-बात पर झगड़ा होता है और अब ये झगड़ा बहुत बढ़
गया है। ऐसे में अब एक ही रास्ता बचा है कि अलग
हो जाएं, तलाक ले लें।
मैं चुपचाप बैठा रहा।
निधि जब काफी देर बोल चुकी तो मैंने उससे
कहा कि तुम नितिन को फोन करो और घर बुलाओ, कहो कि संजय
सिन्हा आए हैं।
निधि ने कहा कि उनकी तो बातचीत
नहीं होती, फिर वो फोन कैसे करे?
अज़ीब संकट था। निधि को मैं बहुत पहले से जानता
हूं। मैं जानता हूं कि नितिन से शादी करने के लिए उसने
घर में कितना संघर्ष किया था। बहुत मुश्किल से दोनों के घर वाले
राज़ी हुए थे, फिर धूमधाम से शादी हुई
थी। ढेर सारी रस्म पूरी
की गईं थीं। ऐसा लगता था कि ये
जोड़ी ऊपर से बन कर आई है। पर शादी
के कुछ ही साल बाद दोनों के बीच झगड़े
होने लगे। दोनों एक-दूसरे को खरी-खोटी
सुनाने लगे। और आज उसी का नतीज़ा था
कि संजय सिन्हा निधि के सामने बैठे थे, उनके बीच के
टूटते रिश्तों को बचाने के लिए।
खैर, निधि ने फोन नहीं किया। मैंने ही फोन
किया और पूछा कि तुम कहां हो ? मैं तुम्हारे घर पर हूं, आ जाओ।
नितिन पहले तो आनाकानी करता रहा, पर वो
जल्दी ही मान गया और घर चला आया।
अब दोनों के चेहरों पर तनातनी साफ नज़र आ
रही थी। ऐसा लग रहा था कि
कभी दो जिस्म-एक जान कहे जाने वाले ये पति-
पत्नी आंखों ही आंखों में एक दूसरे
की जान ले लेंगे। दोनों के बीच कई दिनों से
बातचीत नहीं हुई थी।
नितिन मेरे सामने बैठा था। मैंने उससे कहा कि सुना है कि तुम निधि से
तलाक लेना चाहते हो?
उसने कहा, “हां, बिल्कुल सही सुना है। अब हम साथ
नहीं रह सकते।”
मैंने कहा कि तुम चाहो तो अलग रह सकते हो। पर तलाक
नहीं ले सकते।
“क्यों?”
“क्योंकि तुमने निकाह तो किया ही नहीं
है।”
“अरे यार, हमने शादी तो की है।”
“हां, शादी की है। शादी में पति-
पत्नी के बीच इस तरह अलग होने का
कोई प्रावधान नहीं है। अगर तुमने मैरिज़
की होती तो तुम डाइवोर्स ले सकते थे।
अगर तुमने निकाह किया होता तो तुम तलाक ले सकते थे। लेकिन
क्योंकि तुमने शादी की है, इसका मतलब ये
हुआ कि हिंदू धर्म और हिंदी में कहीं
भी पति-पत्नी के एक हो जाने के बाद
अलग होने का कोई प्रावधान है ही नहीं।”
मैंने इतनी-सी बात पूरी
गंभीरता से कही थी, पर दोनों
हंस पड़े थे। दोनों को साथ-साथ हंसते देख कर मुझे बहुत
खुशी हुई थी। मैंने समझ लिया था कि रिश्तों
पर पड़ी बर्फ अब पिघलने लगी है। वो
हंसे, लेकिन मैं गंभीर बना रहा।
मैंने फिर निधि से पूछा कि ये तुम्हारे कौन हैं?
निधि ने नज़रे झुका कर कहा कि पति हैं। मैंने यही
सवाल नितिन से किया कि ये तुम्हारी कौन हैं? उसने
भी नज़रें इधर-उधर घुमाते हुए कहा कि
बीवी हैं।
मैंने तुरंत टोका। ये तुम्हारी
बीवी नहीं हैं। ये
तुम्हारी बीवी इसलिए
नहीं हैं क्योंकि तुम इनके शौहर नहीं।
तुम इनके शौहर नहीं, क्योंकि तुमने इनसे साथ निकाह
नहीं किया। तुमने शादी की है।
शादी के बाद ये तुम्हारी पत्नी
हुईं। हमारे यहां जोड़ी ऊपर से बन कर
आती है। तुम भले सोचो कि शादी तुमने
की है, पर ये सत्य नहीं है। तुम
शादी का एलबम निकाल कर लाओ, मैं सबकुछ
अभी इसी वक्त साबित कर दूंगा।
बात अलग दिशा में चल पड़ी थी। मेरे एक-
दो बार कहने के बाद निधि शादी का एलबम निकाल लाई।
अब तक माहौल थोड़ा ठंडा हो चुका था, एलबम लाते हुए उसने कहा
कि कॉफी बना कर लाती हूं।
मैंने कहा कि अभी बैठो, इन तस्वीरों को
देखो। कई तस्वीरों को देखते हुए मेरी
निगाह एक तस्वीर पर गई जहां निधि और नितिन
शादी के जोड़े में बैठे थे और पांव पूजन की
रस्म चल रही थी। मैंने वो
तस्वीर एलबम से निकाली और उनसे कहा
कि इस तस्वीर को गौर से देखो।
उन्होंने तस्वीर देखी और साथ-साथ पूछ
बैठे कि इसमें खास क्या है?
मैंने कहा कि ये पैर पूजन का रस्म है। तुम दोनों इन
सभी लोगों से छोटे हो, जो तुम्हारे पांव छू रहे हैं।
“हां तो?”
“ये एक रस्म है। ऐसी रस्म संसार के
किसी धर्म में नहीं होती जहां
छोटों के पांव बड़े छूते हों। लेकिन हमारे यहां शादी को
ईश्वरीय विधान माना गया है, इसलिए ऐसा माना जाता है
कि शादी के दिन पति-पत्नी दोनों विष्णु और
लक्ष्मी के रूप हो जाते हैं। दोनों के भीतर
ईश्वर का निवास हो जाता है। अब तुम दोनों खुद सोचो कि क्या
हज़ारों-लाखों साल से विष्णु और लक्ष्मी
कभी अलग हुए हैं? दोनों के बीच
कभी झिकझिक हुई भी हो तो क्या
कभी तुम सोच सकते हो कि दोनों अलग हो जाएंगे?
नहीं होंगे। हमारे यहां इस रिश्ते में ये प्रावधान है
ही नहीं। तलाक शब्द हमारा
नहीं है। डाइवोर्स शब्द भी हमारा
नहीं है।
यहीं दोनों से मैंने ये भी पूछा कि बताओ कि
हिंदी में तलाक को क्या कहते हैं?
दोनों मेरी ओर देखने लगे। उनके पास कोई जवाब था
ही नहीं। फिर मैंने ही कहा
कि दरअसल हिंदी में तलाक का कोई विकल्प
नहीं। हमारे यहां तो ऐसा माना जाता है कि एक बार एक
हो गए तो कई जन्मों के लिए एक हो गए। तो प्लीज़ जो
हो ही नहीं सकता, उसे करने
की कोशिश भी मत करो। या फिर पहले
एक दूसरे से निकाह कर लो, फिर तलाक ले लेना।”
अब तक रिश्तों पर जमी बर्फ काफी पिघल
चुकी थी।
निधि चुपचाप मेरी बातें सुन रही
थी। फिर उसने कहा कि
भैया, मैं कॉफी लेकर आती हूं।
वो कॉफी लाने गई, मैंने नितिन से बातें शुरू कर
दीं। बहुत जल्दी पता चल गया कि बहुत
ही छोटी-छोटी बातें हैं, बहुत
ही छोटी-छोटी इच्छाएं हैं,
जिनकी वज़ह से झगड़े हो रहे हैं।
खैर, कॉफी आई। मैंने एक चम्मच
चीनी अपने कप में डाली।
नितिन के कप में चीनी डाल ही
रहा था कि निधि ने रोक लिया, “भैया इन्हें शुगर है।
चीनी नहीं लेंगे।”
लो जी, घंटा भर पहले ये इनसे अलग होने
की सोच रही थीं और अब
इनके स्वास्थ्य की सोच रही हैं।
मैं हंस पड़ा। मुझे हंसते देख निधि थोड़ा झेंपी।
कॉफी पी कर मैंने कहा कि अब तुम लोग
अलगे हफ़्ते निकाह कर लो, फिर तलाक में मैं तुम दोनों
की मदद करूंगा।
जब तक निकाह नहीं कर लेते तब तक “हम्मा-
हम्मा-हम्मा, एक हो गए हम और तुम” वाला गाना गाओ, मैं चला।
मैं जानता हूं कि अब तक दोनों एक हो गए होंगे। हिंदी
एक भाषा ही नहीं संस्कृति है।

Sunday, 28 January 2018

क्रांति तो होनी है....

अगर खिलाफ है होने दो, चाँद थोड़ी है
ये सब धुआ है कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आयेंगे घर कई जद में
यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है

मुझे खबर है के दुश्मन भी कम नहीं
हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुह से जो निकले वही सदाकत है
हमारे मुह में तुम्हारी जुबान थोड़ी है

जो आज साहिबे मसनद है कल नहीं होंगे
किरायेदार है ज़ाती, मकान थोड़ी है

सभी का खून है शामिल यहाँ की मिटटी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है-

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साजिशे हवाऐं इस कद्र करने लगी है
पक्तियाँ शाख से टूटकर गिरने लगी है।

जहर घुलता जा रहा है फिजाँओ मे
कि साँस भी बार बार उखाड़ने लगी है।

मिलकर घर का बोझ उठाएं हुऐ थी
वो चार दीवारे भी अब हिलने लगी है।

चिराग अंधेरो से लड़ते रहे रात भर
रात रौशनी के साये मे पलने लगी है।

कभी मुस्कान थी,हर दिल मे भरी
अब माथे मे सलवटे पड़ने लगी है।

सारा दिन धुंध से सूरज लड़ता रहा
कि अचानक फिर शाम ढलने लगी है।

Sunday, 14 January 2018

अजब-गजब संस्कृति और दिखावा

#अजब गजब #संस्कृति और #दिखावा
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पैदा होते ही बेटा हुआ तो कुआं पूजन , बेटी हुई तो - या होई है चुडेल ।
माँ-बाप के लिए दोनो  बेटा समान , शादी होते ही  न्यारा , बडा बेटा रखेगा माँ को , छोटा बेटा बाप को , कर दिया अलग अलग , न्यारा तो एक दिन होना ही है ।
बहु घूघट मे गाली दे तो संस्कृति , घूघट ना रखकर बाप समान इज्जत दे तो , पडौसियो के ताने , क्योंकि संस्कृति ।
किसी गरीब के बच्चे के लिए 5000 रूपये पढाई के लिए देने बाला कोई नही, लेकिन नुक्ते के लिए 50000 हजार देने बाले हजारों , संस्कृति है भैया ।
अनपढ़ बेटी के लिए रिश्ता ढूंढ़ने मे पाँच साल लगा दिये , किसी की बेटी को जयपुर पढने भैज दिया तो ताने , बिगड़ जायेगी । संस्कृति ।
भैंस ने दुध नही दिया , दुध फट गया , बेटा नौकरी नही लगा , बुखार , पेट मे दर्द , अऊत , भूत , जिंद , सबका उपचार है , झाडा फूख । या फिर बालाजी के पाँच किलो घी । संस्कृति ।
आदमी दिनभर ताश खैलौ दुकान या चौराहे पर , घर मे सही ढंग की सब्जी ना बणी तो पिटाई , संस्कृति - क्योंकि बामणा का ने कही है पति परमेश्वर होता है ।
बच्चे सर्दी मे ठिठरते रहो , लेकिन बाप शाम को दारू अवश्य पियेगा । सोमरस है भैया , वेदों मे लिखा है ।
बेटा किसी की लड़की को भले घर ही ले आऔ , बेटी तो नज़र निचे करके ही जायेगी । क्योंकि संस्कृति है भैया । और फिर अपणा तो बेटा है , बेटी बाडा जाणै ।
जितना प्रचार किसी गरीब के बेटे का नौकरी लगने पर नही होता , उससे ज्यादा प्रचार 500 रूपये तीन पत्ती मे जीतने बाले का होता है ।
गरीब की लुगाई प्रसब पीडा मे मर जाये , कोई बडी बात नही । अमीर की भैंस ने दुध नही दिया , हजारों आदमी डाँक्टर बणकर पहुँच जायेंगे ।
ससुर , बहु को गाली देकर घर से निकाल देगा , कोई बडी बात नही । लेकिन बहुत ने शर्ट की जगह सिर्फ कब्जा या ब्लाउज पहन रखा है । पूरे गाँव मे प्रचार होगा । संस्कृति है ।
बूढ़े माँ-बाप को कोई रोटी मत दो , मकान से निकालकर टूटे छप्पर मे डाल दो , बच्चों की शादी के समय आनन फानन मे नहला धुलाकर समाज के सामने ढोग कर दो , बहु बेटी खूब गाली दो , कोई नही बोलेगा । लेकिन मरने पर यदि नुक्ता ना किया तो ताने देकर 10 साल बाद भी करा लेगे । संस्कृति ।
बहु यदि महाडायन है किसी ने गलती से कुछ कह दिया , कर दिया केस , दहेज का । सब गाली देणे आ जायेंगे , बिना मामले को समझे । लेकिन बहु दिनभर माँ-बाप से मीठी मीठी गाली देने पर सब चुपचाप । संस्कृति ।
भात जामणा , 30 लूगडी , 15 बेस , और 25 धौती । पहनेगा कोई नही । लेकिन भेजना जरूर पडेगा । पता सबको है ये व्यर्थ है लेकिन किसी ने बोल दिया तो - छौरा पिढ्यौ तो है पण गुण्यौ कौन । संस्कृति ।
घर मे पल्सर खडी है चलाणे के लिए , लेकिन बहु बेटी रात मे निकलती है झाडियो मे शौच के लिए । (खैर शौचालय निर्माण और इसके महत्व मे हमारा समाज बहुत आगे है इसका हमे गर्व है )
भाई के बेटों को कभी दो रूपये नही लगाये पढाई के लिए , लेकिन भाई जमीन बिकने पर , खरीदकर , पूरा श्रेय ले लेगे ,।
बडे भाईसाहब ने छौटो को पढाकर पूरी जिंदगी दाव पर लगा दी , लेकिन छोटे की लुगाई आते ही , कभी भाई बच्चों को दो रूपये ना दे सका । पत्नी व्रता नारा है भैया । खुद के भी बच्चे है ।
लड़का खुले सांड की तरह चौराहे पर लड़की छेडता हो कोई बुराई नही । लड़की ने जींस क्या पहन लिया , माँ-बाप का मरण आ गया ।
समाज मे पटेलो ने पंचायत से शादी मे dj बंद करा दिये , लेकिन दहेज खुले आम चालू रहेगा ।
किसी महिला का सुड्डा गायन फूहड हो गया , लेकिन टीबी मे चड्डी पहने हिरोईन फूहड नही शान है ।
किसी औरत का पति मर गया तो उसपर हर तरीके के इल्जाम लगाने हजारों पहुँच जायेंगे , तरह तरह की बातें करेंगे , लेकिन उसकी सहायता की बारी आई तो काम के बदले काम । वाह रे भगवान ।
माँ-बाप ने अपने खून पसीने से बेटे को दिल्ली मे अफसर बणा दिया , और बेटे ने एक पल बोल दिया - तुममे दिमाग नही है चुपचाप भगवान् का नाम लो , ।
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चाहे शब्द गलत हो ये मेघ-कलम के लेकिन भावना गलत ना हो सकती .,........
दक्षिण भारत से सिर्फ लेखन ही सही, धरातलीय समाजसेवा नही हो सकती .....,!

Wednesday, 27 December 2017

ग्रामीण बच्चों का जीवन

=== ग्राम्य जीवन ====== 
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हम देहात से निकले बच्चे थे। पांचवी तक घर से तख्ती लेकर स्कूल गए थे. स्लेट को जीभ से चाटकर अक्षर मिटाने की हमारी स्थाई आदत थी ..
कक्षा के तनाव में स्लेटी खाकर हमनें तनाव मिटाया था। स्कूल में टाट पट्टी की अनुपलब्धता में घर से खाद या बोरी का कट्टा बैठने के लिए बगल में दबा कर भी ले जातें थे।.

कक्षा छः में पहली दफा हमनें अंग्रेजी का कायदा पढ़ा और पहली बार एबीसीडी देखी स्मॉल लेटर में बढ़िया एफ बनाना हमें बारहवीं तक भी न आया था। .
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हम देहात के बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया थी , कपड़े के बस्ते में किताब और कापियां लगाने का विन्यास हमारा अधिकतम रचनात्मक कौशल था। तख्ती पोतने की तन्मयता हमारी एक किस्म की साधना ही थी। हर साल जब नई कक्षा के बस्ते बंधते (नई किताबें मिलती) तब उन पर गत्ता चढ़ाना हमारे जीवन का स्थाई उत्सव था। .

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ब्लू शर्ट और खाकी पेंट में जब हम इंटरमीडिएट पहूँचे तो पहली दफा खुद के कुछ बड़े होने का अहसास हुआ। गाँव से 4-5 किलोमीटर दूर के कस्बें में साईकिल से रोज़ सुबह कतार बना कर चलना और साईकिल की रेस लगाना हमारे जीवन की अधिकतम प्रतिस्पर्धा थी। हर तीसरे दिन पंप को बड़ी युक्ति से दोनों टांगो के मध्य फंसाकर साईकिल में हवा भरतें मगर फिर भी खुद की पेंट को हम काली होने से बचा न पाते थे। स्कूल में पिटते मुर्गा बनतें मगर हमारा ईगो हमें कभी परेशान न करता
...... हम देहात के बच्चें शायद तब तक जानते नही थे कि ईगो होता क्या है ... क्लास की पिटाई का रंज अगले घंटे तक काफूर हो गया होता और हम अपनी पूरी खिलदण्डिता से हंसते पाए जाते। .
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रोज़ सुबह प्रार्थना के समय पीटी के दौरान एक हाथ फांसला लेना होता मगर फिर भी धक्का मुक्की में अड़ते भिड़ते सावधान विश्राम करते रहते। हम देहात के निकले बच्चें सपनें देखने का सलीका नही सीख पातें अपनें माँ बाप को ये कभी नही बता पातें कि हम उन्हें कितना प्यार करते है।
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हम देहात से निकले बच्चें गिरतें सम्भलतें लड़ते भिड़ते दुनिया का हिस्सा बनतें है कुछ मंजिल पा जाते है कुछ यूं ही खो जाते है। एकलव्य होना हमारी नियति है शायद।
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देहात से निकले बच्चों की दुनिया उतनी रंगीन होती वो ब्लैक एंड व्हाइट में रंग भरने की कोशिश जरूर करतें हैं। पढ़ाई फिर नौकरी के सिलसिलें में लाख शहर में रहें लेकिन हम देहात के बच्चों के अपने देहाती संकोच जीवन पर्यन्त हमारा पीछा करते है नही छोड़ पाते है..

सुड़क सुड़क की ध्वनि के साथ चाय पीना अनजान जगह जाकर रास्ता कई कई दफा पूछना। कपड़ो को सिलवट से बचाए रखना और रिश्तों को अनौपचारिकता से बचाए रखना हमें नही आता है। अपने अपने हिस्से का निर्वासन झेलते हम बुनते है कुछ आधे अधूरे से ख़्वाब और फिर जिद की हद तक उन्हें पूरा करने का जुटा लाते है आत्मविश्वास।

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हम देहात से निकलें बच्चें थोड़े अलग नही पूरे अलग होते है... अपनी आसपास की दुनिया में जीते हुए भी खुद को हमेशा पाते है थोड़ा प्रासंगिक थोड़ा अप्रासंगिक